Kisan Jugat

भारत में किसानों कि हालत कभी भी अच्छी नहीं थी तो भी प्राचीन काल के ग्रामीण संस्कृति के दिनों में किसानों का शोषण नहीं होता था किसान ही समस्त प्रजा का भरण पोषण करता था । वह स्वावलंबी सुखी और समर्थ था संस्कृति के शुभ संस्कारों से वह वंचित नहीं था राजाओं के छोटे बड़े नगर दर असल गांवों के आश्रित थे । गांवों को चूसने की कला बिल्कुल प्राथमिक अवस्था में थी इसलिए गांवों में जीवन का सौख्य और सौभाग्य काफी मात्रा में पाया जाता था ‌। स्वावलंबन के पुरूषार्थ के बिना गांव जी ही नहीं सकते थे ‌। इसलिए हमारे गांव में देश के और धर्म के अच्छे अच्छे नेता भी पैदा होते थे लेकिन यह स्थिति धीमे धीमे बदलती गयी, बिगड़ती गयी और गांवों का शोषण करने की शहरों की शक्ति बढ़ने लगी । राजनीतिक सामर्थ्य तो शहरों में ही रहता था । वहां उधोग,हुनर और कला – कौशल्य इकट्ठा होने लगे । विलासिता बढी विलासिता की अभद्रता को ढांकने के लिए कृत्रिम संस्कारिता का आविष्कार हुआ । शहरों में शोषण और दंभ जैसे जैसे बढ़ते गये, वैसे-वैसे गांवों की दरिद्रता और असहायता भी बढ़ने लगी । जीवन रसिक लोग गांवों को छोड़कर शहरों में जाकर बसने लगे । पुरूषार्थी लोग भी उसी ओर चले। और लोगों में यह कहावत प्रचलित हुयी : ‘ आ पड़े कहर तो छोडना तो भी छोडना नहीं शहर ।’ धर्माचार्य भी कहने लगे कि जहां पानी का प्रबंध अच्छा हो, रक्षा के राजकर्मचारी हो, सब तरह के चीजें खरीद सकें ऐसे बाजार हो , पुरुषार्थ तथा कौशल्य की कदर करने वाले राजा बसते हो और वैध भी उपलब्ध हो , ऐसे ही स्थान पसंद करने चाहिए । गांवों का शोषण केवल धनधान्य तक सीमित नहीं रहा । उत्साह, पुरुषार्थ और कौशल्य लोग भी गांवों को छोड़कर शहरों में जा बसने लगे । ऐसी दुर्दशा में सारे देश में परदेशी लोगों का राज्य शुरू हुआ । परदेश आये हुए राज्यकर्ता, सैनिक और उनके आश्रित गुणीजन गांवों में जाकर बसने वाले थोड़े ही थे ? उन्होंने बड़े बड़े शहरों को आबाद किया और गांवों को चूसने की तरकीब को व्यवस्थित रूप दिया । इतना होने पर भी गांवों की समाज-व्यवस्था और जीवन -व्यवस्था अक्षुण्ण थी । पश्चिम से भिन्न संस्कृति वाले गोरे लोग आये और धीरे धीरे हमारे गांव की जीवन व्यवस्था टूटने लगी । जाति भेद के कारण ऊपर की जातियां नीचे की जातियों को दबाती तो थी ही लेकिन जीवन में परस्पराव लंबन प्रधान था, इसलिए शोषण में कुछ मर्यादा रहती थी। लेकिन जब परदेशी हुनर की चीजें हमारे बाजारों में बिकने लगी तबतो हमारे गांव का जीवन बिष्मय और बिषादमय हो गया । ऐसी विपत्ति में इस असहाय गांव को इस घोर संकट से कैसे निकाला जाय यही एक बड़ा सवाल देश के सामने था जिसका हल ढूंढने या सोचने की हिम्मत देश के नेता नहीं कर सकते थे । ऐसी हालत में राज्य सत्ता की मदद के बिना, विशाल संगठन या धन की मदद के बिना, केवल मानव -प्रेम , सेवा भाव, स्वार्थत्याग और स्वावलंबन के बल पर और सबसे बिशेष तो आत्मश्रध्दा के बल पर हम गांवों का उद्धार हम कैसे कर सकते हैं । ….next page .. में……………….. लेखक- जयप्रकाश पटेल

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